अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बदले हुए से लगते हैं अब मौसमों के रंग
पड़ता है आसमान का साया ज़मीन पर
- हमदम कशमीरी
जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया
- नासिर काज़मी
कभी मेरी तलब कच्चे घड़े पर पार उतरती है
कभी महफ़ूज़ कश्ती में सफ़र करने से डरता हूँ
- फ़रीद परबती
कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
- राजेन्द्र मनचंदा बानी
Urdu Poetry: आईना नहीं दिल मगर आईना-नुमा है