Urdu Poetry: सुब्ह होते ही निकल आते हैं बाज़ार में लोग

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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सुब्ह होते ही निकल आते हैं बाज़ार में लोग
गठरियाँ सर पे उठाए हुए ईमानों की
- अहमद नदीम क़ासमी 

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परेशानी अगर है तो परेशानी का हल भी है
परेशाँ-हाल रहने से परेशानी नहीं जाती
- अबरार अहमद काशिफ़

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तू भी सादा है कभी चाल बदलता ही नहीं
हम भी सादा हैं इसी चाल में आ जाते हैं
- अफ़ज़ल ख़ान

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शाम होती है तो लगता है कोई रूठ गया
और शब उस को मनाने में गुज़र जाती है
- अशफ़ाक़ नासिर

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Urdu Poetry: काटी हैं हम ने यूँ भी दिसम्बर की सर्दियाँ

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