Urdu Poetry: ज़िंदगी के हसीन तरकश में कितने बे-रहम तीर होते हैं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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ज़िंदगी के हसीन तरकश में
कितने बे-रहम तीर होते हैं
- अब्दुल हमीद अदम 

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मैं चाहता हूँ यहीं सारे फ़ैसले हो जाएँ
कि इस के ब'अद ये दुनिया कहाँ से लाऊँगा मैं
- इरफ़ान सिद्दीक़ी 

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फिर से ख़ुदा बनाएगा कोई नया जहाँ
दुनिया को यूँ मिटाएगी इक्कीसवीं सदी
- बशीर बद्र 

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दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले
हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले
- कैफ़ भोपाली 

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