अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बस जान गया मैं तिरी पहचान यही है
तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
- अकबर इलाहाबादी
ये सुब्ह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया
- नासिर काज़मी
फिर वही लम्बी दो-पहरें हैं फिर वही दिल की हालत है
बाहर कितना सन्नाटा है अंदर कितनी वहशत है
- ऐतबार साजिद
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
- बशीर बद्र
Urdu Poetry: अगर बदल न दिया आदमी ने दुनिया को