अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा
अकेला हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ
- अज्ञात
कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
- राजेन्द्र मनचंदा बानी
मैं क्या करूँ मिरे क़ातिल न चाहने पर भी
तिरे लिए मिरे दिल से दुआ निकलती है
- अहमद फ़राज़
हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है
- दाग़ देहलवी
Urdu Poetry: अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे