अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
- बशीर बद्र
ज़िंदगी तुझ से हर इक साँस पे समझौता करूँ
शौक़ जीने का है मुझ को मगर इतना भी नहीं
- मुज़फ़्फ़र वारसी
ये इल्तिजा दुआ ये तमन्ना फ़ुज़ूल है
सूखी नदी के पास समुंदर न जाएगा
- हयात लखनवी
Urdu Poetry: मोहब्बत जिस से हो बस वो हसीं है