अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के
अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के
- फ़रहत एहसास
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
- मिर्ज़ा ग़ालिब
अब तो कुछ भी याद नहीं है
हम ने तुम को चाहा होगा
- मज़हर इमाम
Urdu Poetry: वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा