अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए
तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए
- बशीर बद्र
दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के क़ाबिल=
जिस शख़्स ने हालात का रुख़ मोड़ दिया हो
- अज्ञात
सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है
चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी
- जलील मानिकपुरी
अपने माथे की शिकन तुम से मिटाई न गई
अपनी तक़दीर के बल हम से निकाले न गए
- जलील मानिकपुरी
विश्व उर्दू दिवस: ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले