अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगर
सर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े
- इक़बाल अज़ीम
आज तक दिल की आरज़ू है वही
फूल मुरझा गया है बू है वही
- जलाल मानिकपुरी
इब्तिदा ये थी कि मैं था और दा'वा इल्म का
इंतिहा ये है कि इस दा'वे पे शरमाया बहुत
- जगन्नाथ आज़ाद
दिन किसी तरह से कट जाएगा सड़कों पे 'शफ़क़'
शाम फिर आएगी हम शाम से घबराएँगे
- फ़ारूक़ शफ़क़
Urdu Poetry: जो जा चुका है उसे लौट कर नहीं आना