अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते
- अहमद फ़राज़
सुब्ह तक कौन जियेगा शब-ए-तन्हाई में
दिल-ए-नादाँ तुझे उम्मीद-ए-सहर है भी तो क्या
- मुज़्तर ख़ैराबादी
धूप बढ़ते ही जुदा हो जाएगा
साया-ए-दीवार भी दीवार से
- बहराम तारिक़
बताएँ क्या कि बेचैनी बढ़ाते हैं वही आ कर
बहुत बेचैन हम जिन के लिए मालूम होते हैं
- मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
Urdu Poetry: सुब्ह होते ही निकल आते हैं बाज़ार में लोग