Urdu Poetry: ज़ेहरा निगाह के चुनिंदा शेर

अमर उजाला काव्य डेस्क    

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अच्छे शेरों की परख तुम ने ही सिखलाई मुझे
अपने अंदाज़ से कहना भी तुम्ही से सीखा     

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दफ़्तर मंसब दोनों ज़ेहन को खा लेते हैं
घर वालों की क़िस्मत में तन रह जाता है    

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इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं
आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं  

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अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है
कोई आ जाए तो वक़्त गुज़र जाता है  

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देखते देखते इक घर के रहने वाले
अपने अपने ख़ानों में बट जाते हैं  

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Urdu Poetry: तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँ नहीं आते

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