अमर उजाला काव्य डेस्क
अच्छे शेरों की परख तुम ने ही सिखलाई मुझे
अपने अंदाज़ से कहना भी तुम्ही से सीखा
दफ़्तर मंसब दोनों ज़ेहन को खा लेते हैं
घर वालों की क़िस्मत में तन रह जाता है
इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं
आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं
अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है
कोई आ जाए तो वक़्त गुज़र जाता है
देखते देखते इक घर के रहने वाले
अपने अपने ख़ानों में बट जाते हैं
Urdu Poetry: तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँ नहीं आते