Urdu Poetry: कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब, आज तुम याद बे-हिसाब आए

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
- साहिर लुधियानवी 

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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
- मीर तक़ी मीर 

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मुझ से बिगड़ गए तो रक़ीबों की बन गई
ग़ैरों में बट रहा है मिरा ए'तिबार आज
- अहमद हुसैन माइल 

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ये इक शजर कि जिस पे न काँटा न फूल है
साए में उस के बैठ के रोना फ़ुज़ूल है
- शहरयार 

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Urdu Poetry: ज़िंदगी के हसीन तरकश में कितने बे-रहम तीर होते हैं

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