अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कभी 'फ़राज़' से आ कर मिलो जो वक़्त मिले
ये शख़्स ख़ूब है अशआर के अलावा भी
- अहमद फ़राज़
जी ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए
- मिर्ज़ा ग़ालिब
ख़फ़ा हैं फिर भी आ कर छेड़ जाते हैं तसव्वुर में
हमारे हाल पर कुछ मेहरबानी अब भी होती है
- अख़्तर शीरानी
तिश्ना-लब ऐसा कि होंटों पे पड़े हैं छाले
मुतमइन ऐसा हूँ दरिया को भी हैरानी है
- क़मर अब्बास क़मर
Urdu Poetry: ऐ काश हमारी क़िस्मत में ऐसी भी कोई शाम आ जाए