Urdu Poetry: मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे
न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे
- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ 

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धोका है इक फ़रेब है मंज़िल का हर ख़याल
सच पूछिए तो सारा सफ़र वापसी का है
- राजेश रेड्डी 

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दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है
- हसरत मोहानी 

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धूप निकली है बारिशों के ब'अद
वो अभी रो के मुस्कुराए हैं
- अंजुम लुधियानवी

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Urdu Poetry: शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे

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