Urdu Poetry: सज्दे किसी के दर पे किए जा रहा हूँ मैं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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मक़्बूल हों न हों ये मुक़द्दर की बात है
सज्दे किसी के दर पे किए जा रहा हूँ मैं
- जोश मलसियानी 

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किसी को भेज के ख़त हाए ये कैसा अज़ाब आया
कि हर इक पूछता है नामा-बर आया जवाब आया
- अहसन मारहरवी

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ग़म की दुनिया रहे आबाद 'शकील'
मुफ़लिसी में कोई जागीर तो है
- शकील बदायूंनी 

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अब तक न ख़बर थी मुझे उजड़े हुए घर की
वो आए तो घर बे-सर-ओ-सामाँ नज़र आया
- जोश मलीहाबादी

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Urdu Poetry: पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है

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