अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
नहीं है मेरे मुक़द्दर में रौशनी न सही
ये खिड़की खोलो ज़रा सुब्ह की हवा ही लगे
- बशीर बद्र
ख़ुश्बू को फैलने का बहुत शौक़ है मगर
मुमकिन नहीं हवाओं से रिश्ता किए बग़ैर
- बिस्मिल सईदी
ये और बात कि इक़रार कर सकें न कभी
मिरी वफ़ा का मगर उन को ए'तिबार तो है
- अलीम अख़्तर मुज़फ़्फ़र नगरी
कितने शिकवे गिले हैं पहले ही
राह में फ़ासले हैं पहले ही
- फ़ारिग़ बुख़ारी
Urdu Poetry: तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए