अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मैं उस के वादे का अब भी यक़ीन करता हूँ
हज़ार बार जिसे आज़मा लिया मैं ने
- मख़मूर सईदी
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
- बशीर बद्र
हाए रे मजबूरियाँ महरूमियाँ नाकामियाँ
इश्क़ आख़िर इश्क़ है तुम क्या करो हम क्या करें
- जिगर मुरादाबादी
वहशतें इश्क़ और मजबूरी
क्या किसी ख़ास इम्तिहान में हूँ
- ख़ुर्शीद रब्बानी
Urdu Poetry: कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है, ज़िंदगी एक नज़्म लगती है