अमर उजाला काव्य डेस्क
ज़रा रूठ जाने पे इतनी ख़ुशामद
'क़मर' तुम बिगाड़ोगे आदत किसी की
- क़मर जलालवी
गिरते हैं समुंदर में बड़े शौक़ से दरिया
लेकिन किसी दरिया में समुंदर नहीं गिरता
- क़तील शिफ़ाई
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तेरे आने की क्या उमीद मगर
कैसे कह दूँ कि इंतिज़ार नहीं
- फ़िराक़ गोरखपुरी
ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ
तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ
- मुनीर नियाज़ी
Urdu Poetry: ऐसे शेर जिनमें जीवन दर्शन छुपा है