Urdu Poetry: इतने घने बादल के पीछे, कितना तन्हा होगा चाँद

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चाँद
- परवीन शाकिर 

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रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है
- वसीम बरेलवी 

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कौन ताक़ों पे रहा कौन सर-ए-राहगुज़र
शहर के सारे चराग़ों को हवा जानती है 
- अहमद फ़राज़ 

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देखो दुनिया है दिल है
अपनी अपनी मंज़िल है
- महबूब ख़िज़ां 

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Urdu Poetry: मैं जो सोता हूँ तो जाग उठती है क़िस्मत मेरी

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