अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर
जंगल तिरे पर्बत तिरे बस्ती तिरी सहरा तिरा
- इब्न-ए-इंशा
बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता
- निदा फ़ाज़ली
कोई फ़रियाद तिरे दिल में दबी हो जैसे
तू ने आँखों से कोई बात कही हो जैसे
- फ़ैज़ अनवर
मैं आ गया हूँ वहाँ तक तिरी तमन्ना में
जहाँ से कोई भी इम्कान-ए-वापसी न रहे
- महमूद गज़नी
Urdu Poetry: कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी