अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बात नहीं सुनती हो क्यूँ
ग़ज़लें भी तो सुनती हो
- अली ज़रयून
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
- बशीर बद्र
हम तोहफ़े में घड़ियाँ तो दे देते हैं
इक दूजे को वक़्त नहीं दे पाते हैं
- फरीहा नक़वी
जो उन मासूम आँखों ने दिए थे
वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ
- फ़िराक़ गोरखपुरी
Urdu Poetry: सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ