अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
- ख़्वाजा मीर दर्द
जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी
देखा तो वो तस्वीर हर इक दिल से लगी थी
- अहमद फ़राज़
वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का
जो पिछली रात से याद आ रहा है
- नासिर काज़मी
सारा दिन तपते सूरज की गर्मी में जलते रहे
ठंडी ठंडी हवा फिर चली सो रहो सो रहो
- नासिर काज़मी
Urdu Poetry: हम अपने शहर में होते तो घर गए होते