अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मैं कश्ती में अकेला तो नहीं हूँ
मिरे हमराह दरिया जा रहा है
- अहमद नदीम क़ासमी
ग़ुस्से में बरहमी में ग़ज़ब में इताब में
ख़ुद आ गए हैं वो मिरे ख़त के जवाब में
- दिवाकर राही
न माँगिये जो ख़ुदा से तो माँगिये किस से
जो दे रहा है उसी से सवाल होता है
- लाला माधव राम जौहर
अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ
- मुसव्विर सब्ज़वारी
Urdu Poetry: हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर', उदासी बाल खोले सो रही है