Urdu Poetry: वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
- साहिर लुधियानवी 

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भले ही लाख हवालों के साथ कहते हैं
मगर वो सिर्फ़ किताबों की बात कहते हैं
- सदा अम्बालवी   

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गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 

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पता अब तक नहीं बदला हमारा
वही घर है वही क़िस्सा हमारा
- अहमद मुश्ताक़ 

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