अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
- मिर्ज़ा ग़ालिब
ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में
- जौन एलिया
आवाज़ दे रहा था कोई मुझ को ख़्वाब में
लेकिन ख़बर नहीं कि बुलाया कहाँ गया
- फ़ैसल अजमी
तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद
शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो
- इरफ़ान सिद्दीक़ी
Urdu Poetry: बात नहीं सुनती हो क्यूँ, ग़ज़लें भी तो सुनती हो