अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
और तो क्या था बेचने के लिए
अपनी आँखों के ख़्वाब बेचे हैं
- जौन एलिया
लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ
- बशीर बद्र
सब कुछ तो है क्या ढूँढ़ती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता
- निदा फ़ाज़ली
सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता
- अमीर मीनाई
Urdu Poetry: ज़िंदगी को मैं किताबों से अलग रखता हूँ