Urdu Poetry: मैं अब हर शख़्स से उक्ता चुका हूँ

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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मैं अब हर शख़्स से उक्ता चुका हूँ
फ़क़त कुछ दोस्त हैं और दोस्त भी क्या
- जौन एलिया 

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जहाँ पहुँच के क़दम डगमगाए हैं सब के
उसी मक़ाम से अब अपना रास्ता होगा
- आबिद अदीब

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नहीं है मेरे मुक़द्दर में रौशनी न सही
ये खिड़की खोलो ज़रा सुब्ह की हवा ही लगे
- बशीर बद्र 

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मुझ को शायर न कहो 'मीर' कि साहब मैं ने
दर्द ओ ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया
- मीर तक़ी मीर 

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Urdu Poetry: ज़िंदगी एक नज़्म लगती है

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