अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
दिल पर दस्तक देने कौन आ निकला है
किस की आहट सुनता हूँ वीराने में
- गुलज़ार
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
- अल्लामा इक़बाल
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है
- बशीर बद्र
अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ
शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या
- मुनीर नियाज़ी
Urdu Poetry: किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल