अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
- अहमद फ़राज़
चले तो पाँव के नीचे कुचल गई कोई शय
नशे की झोंक में देखा नहीं कि दुनिया है
- शहाब जाफ़री
लकीरें खींच के मिट्टी पे बैठ जाता हूँ
यहाँ मकाँ था ये बाज़ार ये गली उस की
- अशरफ़ यूसुफ़ी
नींदों में फिर रहा हूँ उसे ढूँढता हुआ
शामिल जो एक ख़्वाब मिरे रत-जगे में था
- अहमद मुश्ताक़
Urdu Poetry: दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं