Urdu Poetry: अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे
- वसीम बरेलवी 

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इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
- बशीर बद्र 

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रिश्तों का ए'तिबार वफ़ाओं का इंतिज़ार
हम भी चराग़ ले के हवाओं में आए हैं
- निदा फ़ाज़ली    

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दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं
उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया
- दाग़ देहलवी

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Urdu Poetry: वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन

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