Urdu Poetry: बदले हुए से लगते हैं अब मौसमों के रंग

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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बदले हुए से लगते हैं अब मौसमों के रंग
पड़ता है आसमान का साया ज़मीन पर
- हमदम कशमीरी 

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सब्र पर दिल को तो आमादा किया है लेकिन
होश उड़ जाते हैं अब भी तिरी आवाज़ के साथ
- आसी उल्दनी 

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ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को=
ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं
- ख़ुमार बाराबंकवी 

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अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को
मैं ने औरों से सुना है कि परेशान हूँ मैं
- आसी उल्दनी 

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