अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मौत ख़ामोशी है चुप रहने से चुप लग जाएगी
ज़िंदगी आवाज़ है बातें करो बातें करो
- अहमद मुश्ताक़
'मुनीर' इस ख़ूबसूरत ज़िंदगी को
हमेशा एक सा होना नहीं है
- मुनीर नियाज़ी
कोई वक़्त बतला कि तुझ से मिलूँ
मिरी दौड़ती भागती ज़िंदगी
- ख़लील-उर-रहमान आज़मी
हर एक काम है धोका हर एक काम है खेल
कि ज़िंदगी में तमाशा बहुत ज़रूरी है
- ख़लील मामून
Urdu Poetry: तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए