Urdu Poetry: अमीर मीनाई के चुनिंदा शेर

अमर उजाला काव्य डेस्क 

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वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए 

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माँग लूँ तुझ से तुझी को कि सभी कुछ मिल जाए
सौ सवालों से यही एक सवाल अच्छा है 

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आफ़त तो है वो नाज़ भी अंदाज़ भी लेकिन
मरता हूँ मैं जिस पर वो अदा और ही कुछ है 

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हटाओ आइना उम्मीद-वार हम भी हैं
तुम्हारे देखने वालों में यार हम भी हैं 

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गाहे गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है 'अमीर'
क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना जाना 

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Urdu Poetry: ख़ुमार बाराबंकवी के शेर

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