Urdu Poetry: अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे
- वसीम बरेलवी 

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तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो
- कैफ़ी आज़मी

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तमाम ख़ाना-ब-दोशों में मुश्तरक है ये बात
सब अपने अपने घरों को पलट के देखते हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

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तन्हाइयाँ तुम्हारा पता पूछती रहीं
शब-भर तुम्हारी याद ने सोने नहीं दिया
- अज्ञात

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Urdu Poetry: देखो मिरी जाँ आँख लड़ाना नहीं अच्छा

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