अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
आसमाँ एक सुलगता हुआ सहरा है जहाँ
ढूँढ़ता फिरता है ख़ुद अपना ही साया सूरज
- आज़ाद गुलाटी
मुझे अब तुम से डर लगने लगा है
तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या
- जौन एलिया
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की
- परवीन शाकिर
मेरी रुस्वाई के अस्बाब हैं मेरे अंदर
आदमी हूँ सो बहुत ख़्वाब हैं मेरे अंदर
- असद बदायूंनी
Urdu Poetry: मैं ने समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले