अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मक़्बूल हों न हों ये मुक़द्दर की बात है
सज्दे किसी के दर पे किए जा रहा हूँ मैं
- जोश मलसियानी
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे
- बशीर बद्र
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं
- निदा फ़ाज़ली
रात इक शख़्स बहुत याद आया
जिस घड़ी चाँद नुमूदार हुआ
- अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़
Urdu Poetry: सर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े