अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
जंगल जंगल आग लगी है दरिया दरिया पानी है
नगरी नगरी थाह नहीं है लोग बहुत घबराए हैं
- जमील अज़ीमाबादी
उस को हँसता देख के फूल थे हैरत में
वो हँसती थी फूलों की हैरानी पर
- अम्मार यासिर मिगसी
मसअला ये है कि उस के दिल में घर कैसे करें
दरमियाँ के फ़ासले का तय सफ़र कैसे करें
- फ़र्रुख़ जाफ़री
दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था
इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था
- क़तील शिफ़ाई
मंज़िल पे पहुँच सकते नहीं ऐसे मुसाफ़िर
हर गाम पे हो ख़ौफ़ जिन्हें आबला-पा का
- रेशमा नाहीद रेशम
गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी
वो बात अपनी जगह है ये बात अपनी जगह
- बासिर सुल्तान काज़मी
Urdu Poetry: पहले ही से वो बैठ गए मुँह बिगाड़ के