Urdu Poetry: इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो
इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़
- हफ़ीज़ जौनपुरी 

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क्या तिरे शहर के इंसान हैं पत्थर की तरह
कोई नग़्मा कोई पायल कोई झंकार नहीं
- कामिल बहज़ादी 

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बना रहा हूँ मैं फ़ेहरिस्त छोटे लोगों की
मलाल ये कि बड़े नाम इस में आते हैं
- एजाज़ तवक्कल 

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तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता
लफ़्ज़ सूझा तो मआ'नी ने बग़ावत कर दी
- अहमद नदीम क़ासमी 

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Urdu Poetry: जंगल तिरे पर्बत तिरे बस्ती तिरी सहरा तिरा

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