अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तरस रही थीं ये आँखें किसी की सूरत को
सो हम भी दश्त में आब-ए-रवाँ उठा लाए
- सालिम सलीम
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन
- जिगर मुरादाबादी
आँखें खुलीं तो जाग उठीं हसरतें तमाम
उस को भी खो दिया जिसे पाया था ख़्वाब मे
- सिराज लखनवी
मुसीबत और लम्बी ज़िंदगानी
बुज़ुर्गों की दुआ ने मार डाला
- मुज़्तर ख़ैराबादी
Urdu Poetry: तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए