Urdu Poetry: यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है
हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है
- मंज़ूर हाशमी 

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गो आबले हैं पाँव में फिर भी ऐ रहरवो
मंज़िल की जुस्तुजू है तो जारी रहे सफ़र
- नूर क़ुरैशी 

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मिरी तरफ़ से तो टूटा नहीं कोई रिश्ता
किसी ने तोड़ दिया ए'तिबार टूट गया
- अख़्तर नज़्मी 

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उन का ज़िक्र उन की तमन्ना उन की याद
वक़्त कितना क़ीमती है आज कल
- शकील बदायूंनी 

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Urdu Poetry: वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा

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