अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
- मिर्ज़ा ग़ालिब
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले
हँसी आ रही है तिरी सादगी पर
- गोपाल मित्तल
समुंदर अदा-फ़हम था रुक गया
कि हम पाँव पानी पे धरने को थे
- इरफ़ान सिद्दीक़ी
इक और खेत पक्की सड़क ने निगल लिया
इक और गाँव शहर की वुसअत में खो गया
- ख़ालिद सिद्दीक़ी
Urdu Poetry: फ़लसफ़े सारे किताबों में उलझ कर रह गए