अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
अच्छों से पता चलता है इंसाँ को बुरों का
रावन का पता चल न सका राम से पहले
- रिज़वान बनारसी
क़दम क़दम हैं रावन लेकिन
निर्बल के बस राम बहुत हैं
- सब बिलग्रामी
'नज़्र' फिर आया है इक रस्म निभाने का दिन
सज सँवर के सभी रावन को जलाने निकले
- नज़्र फ़ातमी
अब भी खड़ी है सोच में डूबी उजयालों का दान लिए
आज भी रेखा पार है रावण सीता को समझाए कौन
- अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
Urdu Poetry: आज के चुनिंदा शेर