अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं
- जाँ निसार अख़्तर
सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या
उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या
- हफ़ीज़ बनारसी
दिल की चौखट पे जो इक दीप जला रक्खा है
तेरे लौट आने का इम्कान सजा रक्खा है
- वसी शाह
रात को दीप की लौ कम नहीं रक्खी जाती
धुंध में रौशनी मद्धम नहीं रक्खी जाती
- तहज़ीब हाफ़ी
Urdu Shayari: बदले हुए से लगते हैं अब मौसमों के रंग