अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है
और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता
- अहमद फ़राज़
उस ने मंज़िल पे ला के छोड़ दिया
उम्र भर जिस का रास्ता देखा
- नासिर काज़मी
यूँ मुस्कुराए जान सी कलियों में पड़ गई
यूँ लब-कुशा हुए कि गुलिस्ताँ बना दिया
- असग़र गोंडवी
रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए
इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है
- अहमद मुश्ताक़
Urdu Poetry: रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें