अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ
जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से
- साहिर लुधियानवी
मिरी बहार में आलम ख़िज़ाँ का रहता है
हुआ जो वस्ल तो खटका रहा जुदाई का
- जलील मानिकपुरी
मुझे ये डर है तिरी आरज़ू न मिट जाए
बहुत दिनों से तबीअत मिरी उदास नहीं
- नासिर काज़मी
भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी
- नासिर काज़मी
Kaifi Azmi Poetry: तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो