अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें
जिन को मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया
- सुदर्शन फ़ाकिर
क़ब्रों में नहीं हम को किताबों में उतारो
हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरे हैं
- एजाज तवक्कल
जो पढ़ा है उसे जीना ही नहीं है मुमकिन
ज़िंदगी को मैं किताबों से अलग रखता हूँ
- ज़फ़र सहबाई
रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चाँद
- परवीन शाकिर
Urdu Poetry: ज़िंदगी क्या है, सफ़र की बात है