अमर उजाला काव्य डेस्क
कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँ लोग
सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँ नहीं जाते
- महबूब ख़िज़ां
सर्दी में दिन सर्द मिला
हर मौसम बेदर्द मिला
- मोहम्मद अल्वी
मिरे सूरज आ! मिरे जिस्म पे अपना साया कर
बड़ी तेज़ हवा है सर्दी आज ग़ज़ब की है
- शहरयार
कोहरा कोहरा सर्दी है काँप रहा है पूरा गाँव
दिन को तपता सूरज दे रात को कम्बल दे मालिक
- शकील आज़मी
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी
- परवीन शाकिर
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