अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
- अहमद फ़राज़
हमारे ख़्वाब चोरी हो गए हैं
हमें रातों को नींद आती नहीं है
- बख़्श लाइलपुरी
कैसा जादू है समझ आता नहीं
नींद मेरी ख़्वाब सारे आप के
- इब्न-ए-मुफ़्ती
कभी ये फ़िक्र कि वो याद क्यूँ करेंगे हमें
कभी ख़याल कि ख़त का जवाब आएगा
- हिज्र नाज़िम अली ख़ान
Urdu Poetry: सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं