Urdu Poetry: ज़िंदगी दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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तल्ख़ियाँ इस में बहुत कुछ हैं मज़ा कुछ भी नहीं
ज़िंदगी दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
- कलीम आजिज़ 

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इक ज़िंदगी अमल के लिए भी नसीब हो
ये ज़िंदगी तो नेक इरादों में कट गई
- ख़लील क़िदवाई 

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चुप-चाप सुनती रहती है पहरों शब-ए-फ़िराक
तस्वीर-ए-यार को है मिरी गुफ़्तुगू पसंद
- दाग़ देहलवी 

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मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूँ मिरा ए'तिबार मत करना
- आसिम वास्ती 

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Urdu Poetry: हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरे हैं

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