अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
'जमाल' हर शहर से है प्यारा वो शहर मुझ को
जहाँ से देखा था पहली बार आसमान मैं ने
- जमाल एहसानी
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
- बशीर बद्र
मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूँ मिरा ए'तिबार मत करना
- आसिम वास्ती
किसी पे करना नहीं ए'तिबार मेरी तरह
लुटा के बैठोगे सब्र ओ क़रार मेरी तरह
- फ़रीद परबती
Urdu Poetry: आप के बा'द हर घड़ी हम ने, आप के साथ ही गुज़ारी है